तुम थीं और नहीं भी

भीड़ थी, और मैं इज़्तिरार भी
खानाबदोश मेरी नज़रें जब मिली तुमसे
तुम नज़ाकत से शर्मायी थीं और नहीं भी

रास्ते थे, और हम गुमशुदा भी
चंद खूबसूरत लम्हों के लिए आशना थे हम
तुम कुछ करीब आयी थीं और नहीं भी

जुस्तजू थी, और मैं सिफर भी
कुछ पहचाने से पर बिखरे हुए लफ़ज़ों की तरह
तुम याद आयी थीं और नहीं भी

जनाज़ा था, और मैं फना भी
लाल गुलाबों से बिछा हुआ मेरा आखरी सफर
तुम देखने आयी थीं और नहीं भी

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