Ishq/Hijr

पहली बार जब तुम्हे पुरानी दिल्ली के
किसी मेट्रो स्टेशन पर देखा था,
एक ज़लज़ला सा आया और मेरी ज़मीन
तुम्हारी धड़कनों की तरह हिलने सी लगी,
और उस ज़लज़ले के ताराज़ के बीच
तुम मुझे बे-कफ़न छोड़ गयीं थी

वो जनवरी की सर्दी, मेरा लेदर का जैकेट और
तुमने अपनी अम्मी से चुराया हुआ
वो लाल पश्मीना पहना था
सर्द हवाओं और कपकपाते लेकिन
टकराते हुए हाथो के बीच गर्माहट बस तुम्हारी साँसों की थी
बस इतना ही करीब थे की हाथ मिलाकर अलविदा कह सकें
और उन्हीं हाथों में तुम अपनी नफानी खुशबु छोड़ गयीं थी

याद है, वो पहाड़ों वाली बारिश और पानी की
बूंदो से फीकी पड़ती हुई हमारी चाय और तुम्हारी हसी
उन लम्हो में ना तुम पूरी थी,
ना मैं पूरा थाऔर ना ही हम पूरे थे,
बस कुछ अधूरे से थे
और फिर बारिश में मुझसे किये हुए
अधूरे से इश्क़ का इलज़ाम भी तुम मेरे ही सर छोड़ गयीं थी  

क़ुरबत कब तग़ाफ़ुल में बदली
बस पता था तो घड़ी के नुकीले काटों को
पुरानी दिल्ली के उस मेट्रो स्टेशन से आज तक का सफर
बस सिफर सा लग रहा था
अब जाकर समझा की उस दिन आया हुआ ज़लज़ला
बस मेट्रो के आने का शोर था
बे-कफ़न, फीका और अधूरा ही रहा ये इश्क़
इस इश्क़ के नाम पर तुम मेरे पास बस हिज्र छोड़ गयीं थी


Photo by Phil from Pexels

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